हर वक्त की मुझको प्यास, वक्त मेरी तलाश
हर वक्त है जलता रहता कुछ मेरे अन्दर।
कुछ खीच रहा, कुछ तोड़ रहा
हर वक्त है एक जकडन मेरे अन्दर,
तोड़ सकूँ, मैं जोड़ सकूँ,
दिल से दिल का बंधन।
क्यूँ ये चुभन, ज्यूँ ये अगन,
क्यूँ ये तड़पन,
कुछ भी हो जाए, पर कम न हो मेरी लगन।
समझ का फेर, कोई कुछ भी समझे,
पर मैं क्या हूँ ये जान रहा मेरे अन्तर।
मैं नदिया, मैं सागर, कुछ कर लो,
कुछ न होगा मुझ पर असर।
मेरे संग है मेरा हमसफर,
मेरा परमेश्वर।
बारिश का कहर तो धुप सहर,
सूरज करे जब तेज़ असर,
वर्षा जल कर दे बेअसर,
मेरा क्या होगा?
नदिया, सागर क्या जाने,
क्या मिला कब उसके अन्दर?
मुक्त हूँ मैं, उन्मुक्त हूँ मैं,
मुझमे छिपा मीठे जल का एक समंदर,
हंस मोती चुग जाएगा और कौवा पंख फर्फराता रह जाएगा,
मुझे है किसका डर, सर्वशक्तिमान परमपिता मेरे हैं, मेरे अन्दर।
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