क्यूँ मिलाया उससे मुझे, जिससे मेरा रिश्ता नहीं।
जो मेरे जज्बात को थोडा भी समझता है नहीं।
सालों से सोचती रही, कोई तो मिलगा कही, जो समझेगा बात मेरी।
पर ये अभी तक हुआ है नहीं, न है अब मुझको यकीं।
मुझे स्वयं मै मिला लो अब तुम्ही, तुमसे अच्छा कोई नहीं।
धुंध बहुत, पाया नहीं।
मानती हूँ हार मैं, दुरीं सही जाती नहीं।
Saturday, 27 March 2010
Tuesday, 23 March 2010
जिंदगी दे थोरी ख़ुशी
क्यों नहीं देती थोड़ी ख़ुशी, गम का बहाना मैं बनाती रही ।
बहुत हुआ अब और नहीं, अब चाहिए मुझे चाहत मेरी।
क्या लोग कहेंगे, वो तो यूँ हीं कहते रहेंगे.
उनको न हमसे पड़ी हैं न तुमसे, वे बस खफा तो
उनकी to हैं फितरत यही।
जिंदगी का फलसफा हम से बेहतर किसको है पता।
क्यूँ नहीं हैं मुझको खुद पर यकीं, ताकतीं हूँ क्यूँ मैं दुसरे का मुह
क्या मुझे मिल पायेगा मेरा कारवां, जो बस मेरा हो किसी और का नहीं।
दासता की आदत ऐसी है पड़ी की आजादी मुझे अच्छी लगाती नहीं
इसलिए मैं ताकतीं दुसरे का मुख यूँ हीं।
सब तुम्हे जक्डेगे, कोई खुला छोड़ेगा नहीं।
देख लो हर इन्सान की होती हैं फितरत यही।
जी ले अपनी जिंदगी बस और नहीं, कुछ और नहीं।
बहुत हुआ अब और नहीं, अब चाहिए मुझे चाहत मेरी।
क्या लोग कहेंगे, वो तो यूँ हीं कहते रहेंगे.
उनको न हमसे पड़ी हैं न तुमसे, वे बस खफा तो
उनकी to हैं फितरत यही।
जिंदगी का फलसफा हम से बेहतर किसको है पता।
क्यूँ नहीं हैं मुझको खुद पर यकीं, ताकतीं हूँ क्यूँ मैं दुसरे का मुह
क्या मुझे मिल पायेगा मेरा कारवां, जो बस मेरा हो किसी और का नहीं।
दासता की आदत ऐसी है पड़ी की आजादी मुझे अच्छी लगाती नहीं
इसलिए मैं ताकतीं दुसरे का मुख यूँ हीं।
सब तुम्हे जक्डेगे, कोई खुला छोड़ेगा नहीं।
देख लो हर इन्सान की होती हैं फितरत यही।
जी ले अपनी जिंदगी बस और नहीं, कुछ और नहीं।
Thursday, 18 March 2010
मेरी पहचान
मेरी पहचान खो रही है। कोई धुन्ध सी हो रही है। क्या मैं खोज पाऊँगी खुद को, वो मुझमे ही कही है। या मैं खुद में नहीं हूँ किसी और में मिल गयी हूँ। कैसा मिलेगा रास्ता मुझे, कौन दिलाएगा मुझे यकी। क्या गलत है क्या सही। मैं कहा जा रही हूँ रास्ता कहा हैं, मंजिल कहीं। किसको पता हैं मेरा पता। ढूंढ़ पाना स्वयं को आसान नहीं। सालो से तलाश रही हूँ क्यूँ मिलतीं नहीं। कब तक भटकती रहूंगी, कब ख़त्म होगी मेरी तलाश.
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