Monday, 4 August 2008

मेडिकल बाजार

ग्लोबलाइजेशन के ज़माने में जहा सारी दुनिया में सामानों की कीमत का स्तर लगभग सामान हो चला है, वही मेडिकल पर हो रहे खर्च में भारी अन्तर देखा जा रहा है । मशीनी दुनिया में दुनिया के हर कोने में मशीनो की भरमार हें। तकनिकी तरक्की अपने चरम पर है । फ़िर ऐसे में मेडिकल पर हो रहे खर्चे पर इतना अन्तर क्यों ? जब दवाईयां वही डॉक्टर वही तकनीक वही तोक्या है वजह? वही जब विद्यार्थी वही , शिक्षा वाही तो फीस में इतना फर्क क्यूँ? ज्यादा फीस ज्यादा लोन, जिसके लिए चाहिए ज्यादा कमाईलोग शिक्षा और मेडिकल के लिए दुसरे देश जा रहे हें और कम पैसो में इलाज करवाके वापस आ रहे है। वहा सब कुछ कम दामों में मिले तो कोई ये क्यूँ ले वो न ले? फ़िर भी किसी के समझ में कुछ नही आ रहा है, कोई इस जालको तोड़ नही पारहा है। मानवता उदासीन है। over medicated nation aur vikrit mansikta से जूझ रही मानवता सिसकीले रही है । इसके लिए किसको जिम्मेदार ठहराया जाए परिवार , समाज , इंश्योरेंस या में घर? लोग ghar me महीनो पड़े हे और उनके कानो पे जू तक नही रेंगती। डॉक्टर एक ही बात दोहरा रहे है, जब तक न पूछे कुछ भी कहने से कतरा रहे है। उन्हें डर है सु हो जाने का अपनी पोल खुल जाने का , झूठ का परदा उठ जाने का और कला चेहरा दुनिया के सामने आने का । क्यों सेकंड ओपोनियन लेने से घबराते है, दिन काटने के लिए टेस्ट पर टेस्ट करवाते है। वक्त उनका कीमती है पेशेंट का वक्त यु ही है। बाजारवाद की दुनिया में ये दुकानदार है, हम खरीददार सही। इन्हे अपनी दुका चलानी हे इंसानियत से इनकी दुकान नही चलने वाली है । में कहती हु झाँकों अपने गिरेबान में दरो अपने खुदा, भगवन, मसीह और बाहे गुरु से । तुम्हे उनका वास्ता जो तुमने ये कहर मचाया, कराहती मानवता पर थोड़ा तरस न खाया। तुम्हे कसम है , देखो अपने अपनों की और सोचो की क्या करोगे तुम उनके साथ ऐसा ही । तुम्हारे किए की सजा वो भुगते थोड़ा तो शर्म करो और कर लो अपना और अपनों का उद्धार।

Monday, 21 July 2008

खुला आसमान

ये हाईटेक दुनिया सिमटती जा रही हें
आज यहाँ कल वहा क्या पता कब कहा
हर वक्त एक मंजर नया,
अच्छा लगा कुछ यहाँ, कुछ लगा अच्छा वहां;
कुछ पुराना, कुछ नया, पर मेरा हें, सब यहाँ;
खोज रही थी अरसे से , मिल गया वो जहाँ ।
सपना सा पर सच लगा, मिल जाए जो मुझे असर;
थोड़ा सच्चा, थोड़ा झूठा, खुश थी में कोई न रूठा।
हर कोई हें खुश यहाँ, भीना भीना सारा समां।
मुठ्ठी में कुछ भी नही, पर लगता हें जैसे सारा जहाँ।
छू लू में आसमान,तोड़ दू हर बेडियाँ, जो मुझे जकड़ी रहीं सदियों से क्या पता।
आजाद हो कर उड़ सकू में, पंछियों की तरह।
पर हों मेरे और खुला हो आसमान ।

Friday, 11 July 2008

मुझमे मेरा खुदा

मैं एक दरिया हूँ, जिसमे है डूब जाना,
डूब कर इसमे ख़ुद को न भूल जाना।
डूबना मैं चाहती हूँ, मुझे ख़ुद को है पाना,
यही है बस चाहत मेरी यही मेरा फ़साना।
दिल ने दिया न जो मुझे,
ना ही किसी ने, मैं चाहती हूँ वो ख़ुद ही मुझे मिले।
थोड़ा सा सुकून मिले, थोडी चाहत मिले,
तब जाके दिल को मेरे थोडी सी राहत मिले।
दिल टूट जाए न, ये रूठ जाए न,
दिल को बचाना मेरी जान,
तेरे लिए है दिल मेरा।
दिल का कोना मेरा मांगे सबकी दुआ,
पर मुझको न वो भी मिला।
फितरत मेरी कुछ ऐसी रही,
की सब को है मुझसे गिला,
पर मैंने ये जान लिया है,
ख़ुद को पहचान लिया है,
मुझमे है मेरा खुदा।


काश मैं उड़ जाती

काश मैं उड़ जाती यूँ पंख लगाके,
छुओ न मुझे मेरे पास आके।
दिल में जो लगी है उसे न बुझाओ,
नही नही नही, मेरे पास न औ।
भवरे आते है, उड़ जाते हैं,
जाने कुन वो कलियों को बहकते हैं।
दिल तो हैं भवरा, ये उड़ जाएगा,
कलियों के पास जाके गुनगुनाएगा।
जाओ जाओ जाओ , मुझे ना सताओ,
दिल की जो लगी है, उसे ना बढाओ।

मुक्त हूँ मैं

हर वक्त की मुझको प्यास, वक्त मेरी तलाश

हर वक्त है जलता रहता कुछ मेरे अन्दर।

कुछ खीच रहा, कुछ तोड़ रहा

हर वक्त है एक जकडन मेरे अन्दर,

तोड़ सकूँ, मैं जोड़ सकूँ,

दिल से दिल का बंधन।

क्यूँ ये चुभन, ज्यूँ ये अगन,

क्यूँ ये तड़पन,

कुछ भी हो जाए, पर कम न हो मेरी लगन।

समझ का फेर, कोई कुछ भी समझे,

पर मैं क्या हूँ ये जान रहा मेरे अन्तर।

मैं नदिया, मैं सागर, कुछ कर लो,

कुछ न होगा मुझ पर असर।

मेरे संग है मेरा हमसफर,

मेरा परमेश्वर।

बारिश का कहर तो धुप सहर,

सूरज करे जब तेज़ असर,

वर्षा जल कर दे बेअसर,

मेरा क्या होगा?

नदिया, सागर क्या जाने,

क्या मिला कब उसके अन्दर?

मुक्त हूँ मैं, उन्मुक्त हूँ मैं,

मुझमे छिपा मीठे जल का एक समंदर,

हंस मोती चुग जाएगा और कौवा पंख फर्फराता रह जाएगा,

मुझे है किसका डर, सर्वशक्तिमान परमपिता मेरे हैं, मेरे अन्दर।

जीवन सार

जो मरता है वो जीता है,
जो सोता है वो उठता है,
जो रोता है वो हँसता है,
जो खोता है वो पाता है,
रात है तो तो सवेरा है,
प्यास है तो तृप्ति है,
तृप्ति है तो संतुष्टि है,
संतुष्टि है तो सुख भी है,
सुख है तो दुःख भी है,
दुःख के बाद भी सुख ही है,
जीवन सुख दुःख का संगम है,
ये मेरे हृदयंगम है,
नैया है तो खेवैया है,
गाड़ी है तो पहिया है,
सुख दुःख के पतवार से ही चलती अपनी नईया है।

मत भूलो तुम कौन हो

जब कोई अपने देश से आता है, तो वो वहां की ताजगी, सादगी साथ लाता है।
दिल उसका साफ नजर आता है। आँखों में चमक और खुशी का इझ्हार हमें खूब लुभाता है।
वो चमक न जाने कब, कैसे खो जाता है और सब कुछ वापस जैसा था वैसा ही हो जाता है।
क्यूँ ताजगी खो जाती है? जिंदगी बासी हो जाती है। क्यूँ सादगी पर दूसरा रंग चढ़ जाता है?
क्यूँ इंसान इतना मतलबी हो जाता है?
जिंदगी के मायने बदलते हैं, सपने खो जाते हैं, हम किसी और दुनिया के हो जाते हैं।
क्यूँ इंसान इंसानियत को भूल जाता है? दूसरों के दुःख को अपना नही समझ पाता है।
क्यूँ दूसरों की नक़ल में अपना सर्वस्व गंवाता है, बाद में वो रंगा सियार कहलाता है।
अपने अस्तित्व को बदलना बेईमानी है सबको पता है किसमे कितना पानी है।

हमारी हिन्दी

सबसे पहले मुझे मन्दिर जाना है। वहां कुछ दीप जला कर मन के अंधेरे को दूर भगाना है। हिन्दी का विस्तार कर उसे अंतर्राष्ट्रीय बनाना है। हिन्दी शिक्षा, हिंदू शिक्षा का अर्थ समझाना है। कई बार प्रयास हुए, कई बार आवाज़ उठी। अब उसे बुलंद बनाना है। भारत को विश्व गुरु का दर्जा दिलाना है।