ये हाईटेक दुनिया सिमटती जा रही हें
आज यहाँ कल वहा क्या पता कब कहा
हर वक्त एक मंजर नया,
अच्छा लगा कुछ यहाँ, कुछ लगा अच्छा वहां;
कुछ पुराना, कुछ नया, पर मेरा हें, सब यहाँ;
खोज रही थी अरसे से , मिल गया वो जहाँ ।
सपना सा पर सच लगा, मिल जाए जो मुझे असर;
थोड़ा सच्चा, थोड़ा झूठा, खुश थी में कोई न रूठा।
हर कोई हें खुश यहाँ, भीना भीना सारा समां।
मुठ्ठी में कुछ भी नही, पर लगता हें जैसे सारा जहाँ।
छू लू में आसमान,तोड़ दू हर बेडियाँ, जो मुझे जकड़ी रहीं सदियों से क्या पता।
आजाद हो कर उड़ सकू में, पंछियों की तरह।
पर हों मेरे और खुला हो आसमान ।
Monday, 21 July 2008
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