जीवन एक संघर्ष है,
संघर्ष ही उत्कर्ष है,
उत्कर्ष की सीमा संघर्ष है,
ऊंचाई से नीचे गिर जानासंघर्ष है,
जीत को पाना संघर्ष है, जीत न मिल पाना संघर्ष है।
हार पर पछताना संघर्ष है, हरक्षण हर पल संघर्ष है।
संघर्ष से टकराना संघर्ष है।
जीत पर इतराना संघर्ष है, अंहकार का टूटना संघर्ष है।
अंहकार को जीतनासंघर्ष है,
संघर्ष से ghabarana ठीक नही , संघर्ष से ही मिलता जीवन को अर्थ है.
Tuesday, 24 February 2009
Monday, 23 February 2009
मेरी विजययात्रा!
इन्सान बड़ा खुदगर्ज होता है। आइने के सामने खड़ा होकर भी वह सिर्फ़ अपनी अच्छाईयां ही देख पाताहै । अपनी बुरइयओ को वह नजरंदाज़ कर देता है। खुदगर्जी में वह इतना अँधा हो जाता है की उसे सामने वाले की अच्छियाँ दिखती ही नहीं ।
वह ख़ुद को ही सबसे अच्छा समझता लगता है। वह सोचता है की वह सब कुछ कर सकता है। उसमे कुछ ऐसा है जिससे वो सबसे अलग है। उसकी क्षमता सबसे ज्यादा है। वह जो कर सकता है वो कम ही कर पातेहै। और अगर कोई कर भी ले तो हर्जही क्या है? कार्य का सम्पन्न होना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
मुझे आगे बढनाहै तो बाधाएं पारकरनी ही होगी। और जब मैंने ये बाधाएं पार कर ली है तो दूसरो के ऐसा करने से मुझे क्या ऐतराज हो सकता है। मैं अपने रस्ते की रुकावटों से घबराना नही है, परन्तु उन्हें लांघकर विजेता कहलाना है।
जीवन के इस पड़ाव परजब पीछे मुड़कर देखती हूँ तो बहुत कम जीत ही अपने नम दर्ज पाती हूँ। इश्वर की शुक्रगुजार हूँ की मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी जीतमेरे नामकी। ये जीत बरकरार रहे , इसके लिए जीवनपर्यंत प्रयत्न की आवश्यकता है। यही वो बाधाएं है जो मुझे पारकरनी है। मुझे डर है की मेरी जीत कही हारमें न बदल जाए। यही डर मुझमे अजेय शक्ति का संचार कर रहा है। यही विश्वास मुझे जीवन के हरडगर पार विजयी करेगा. इन्ही छोटे छोट विजय अभियाओं में महाविजय का रहस्य छुपा है। जीवन में सबसे बड़ी विजय है- अपने मन और इन्द्रियों पार विजय। यह विजययात्रा ही शान्ति और सुकून दे सकती है। कही और से यह अनमोल उपहार नही मिलने वाला। एक विजय अभियान अशोक का था, तो दूसरा महात्मा बुध का। दोनों में जमीं असमान का अन्तर था। अशोक की यात्रा का हश्र था मार काट , युद्ध , खून-खराबा और कोलाहल और बुध की यात्रा का परिणाम असीमित आत्मिक आनंद, विश्वशांति, दुःख से छुटकारा।
मैं apne liye विजय का कौन सा पथ चुनने जा रही हूँ , बुध का या अशोक का या फ़िर उससे अलग। मैं भी तो वाही चाहती हूँ -सुख , शान्ति, और समृधि। मानव के लिए इससे बरी उपलब्धि और क्या हो सकती है। मेरे लिए तो यही बहुत है। मैंने कभी ज्यादा नही चाहा है अपनी जिंदगी से!
वह ख़ुद को ही सबसे अच्छा समझता लगता है। वह सोचता है की वह सब कुछ कर सकता है। उसमे कुछ ऐसा है जिससे वो सबसे अलग है। उसकी क्षमता सबसे ज्यादा है। वह जो कर सकता है वो कम ही कर पातेहै। और अगर कोई कर भी ले तो हर्जही क्या है? कार्य का सम्पन्न होना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
मुझे आगे बढनाहै तो बाधाएं पारकरनी ही होगी। और जब मैंने ये बाधाएं पार कर ली है तो दूसरो के ऐसा करने से मुझे क्या ऐतराज हो सकता है। मैं अपने रस्ते की रुकावटों से घबराना नही है, परन्तु उन्हें लांघकर विजेता कहलाना है।
जीवन के इस पड़ाव परजब पीछे मुड़कर देखती हूँ तो बहुत कम जीत ही अपने नम दर्ज पाती हूँ। इश्वर की शुक्रगुजार हूँ की मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी जीतमेरे नामकी। ये जीत बरकरार रहे , इसके लिए जीवनपर्यंत प्रयत्न की आवश्यकता है। यही वो बाधाएं है जो मुझे पारकरनी है। मुझे डर है की मेरी जीत कही हारमें न बदल जाए। यही डर मुझमे अजेय शक्ति का संचार कर रहा है। यही विश्वास मुझे जीवन के हरडगर पार विजयी करेगा. इन्ही छोटे छोट विजय अभियाओं में महाविजय का रहस्य छुपा है। जीवन में सबसे बड़ी विजय है- अपने मन और इन्द्रियों पार विजय। यह विजययात्रा ही शान्ति और सुकून दे सकती है। कही और से यह अनमोल उपहार नही मिलने वाला। एक विजय अभियान अशोक का था, तो दूसरा महात्मा बुध का। दोनों में जमीं असमान का अन्तर था। अशोक की यात्रा का हश्र था मार काट , युद्ध , खून-खराबा और कोलाहल और बुध की यात्रा का परिणाम असीमित आत्मिक आनंद, विश्वशांति, दुःख से छुटकारा।
मैं apne liye विजय का कौन सा पथ चुनने जा रही हूँ , बुध का या अशोक का या फ़िर उससे अलग। मैं भी तो वाही चाहती हूँ -सुख , शान्ति, और समृधि। मानव के लिए इससे बरी उपलब्धि और क्या हो सकती है। मेरे लिए तो यही बहुत है। मैंने कभी ज्यादा नही चाहा है अपनी जिंदगी से!
Tuesday, 3 February 2009
दुःख की महिमा
दुःख हमें महान बनाता है , कष्ट हमें इन्सान बनाता है।
दुःख से घबराना ठीक नही , दुखों पर विजय ही सफलता का सोपान बन जाता है।
दुःख को जीतकर ही सुख पाता है , दुःख से लड़कर ही विजयी कहलाता है।
विजय मंत्र है ये , दुःख से भागो नहीउसे यूँ दिल में बसो;
दुःख को सुख में बदलकर सुख के अधिकारी बन जाओ।
दुःख से घबराना ठीक नही , दुखों पर विजय ही सफलता का सोपान बन जाता है।
दुःख को जीतकर ही सुख पाता है , दुःख से लड़कर ही विजयी कहलाता है।
विजय मंत्र है ये , दुःख से भागो नहीउसे यूँ दिल में बसो;
दुःख को सुख में बदलकर सुख के अधिकारी बन जाओ।
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