Monday, 22 February 2010
तड़पती आत्मा
कब तक तड़पती रहूंगी कब तक सब सहती रहूंगी। कहके भी दिल भरता नहीं, ऐसे ही जीने का क्या फायदा। हे परमपिता मुझे दो वो शक्ति की मै अपने दम पर लड़ सकू दुनिया से। कह सकू मेरी क्या हे खता। जो किया हो गुनाह तो तुम कौन होते हो देने वाले मुझे सजा। कहो जो कहना हे, मुझे नहीं तदपा, क्यूंकि मैं अब नहीं सहूंगी, दुर्गा शक्ति का तुम्हे मर्म समझूंगी। एक दिन सब जानेगे मतलब मेरी बात का, मुझे हैं इसका भरोसा। तुमने चुना है गलत रास्ता, साथ नहीं दूंगी मैं तुम्हारा। मैं जा रही हूँ कोई नहीं रोक सकता मुझे। मेरी दुनिया अलग है उसमे तुम कही भी नहीं। माँ मुझे शरण मै ले लो, रो रहा हे मन मेरा। अब नहीं रहना यु ही व्यर्थ मै यहाँ कह दिया न जी नहीं लगता। अमृत पिला अपनी अंचल मै दे दो मुझे वो वर्चस्व बड़ा, जिससे हो सबका भला। कोई आपको न कह सके बुरा, बस आपकी जय हो और कुछ भी न हो वहां।
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