Tuesday, 27 January 2009

मेरी मंजिल !

कभी कभी ऐसा लगता है जैसे कुछ तो है जो मुझे रोक रहा है मंजिल की ओर जाने से और दुसरे पल लगता है मंजिल मेरे और पास है । हर पल me कुछ khas है जो मंजिल मेरे पास है , मेरी जिंदगी लेखन के लिए ही बनी है यकीनन । दुनिया की चकाचौंध में खोकर मै कुछ नही कर पाती , घर की चाहरदीवारी में मैंने दुनिया समेट ली है । पुरी दुनिया मेरी है और मै सबकी , ये भान मुझे मंजिल ले मिलाये। यही मेरी मनोकामना है , तथास्तु!

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