Thursday, 18 March 2010

मेरी पहचान

मेरी पहचान खो रही है। कोई धुन्ध सी हो रही है। क्या मैं खोज पाऊँगी खुद को, वो मुझमे ही कही है। या मैं खुद में नहीं हूँ किसी और में मिल गयी हूँ। कैसा मिलेगा रास्ता मुझे, कौन दिलाएगा मुझे यकी। क्या गलत है क्या सही। मैं कहा जा रही हूँ रास्ता कहा हैं, मंजिल कहीं। किसको पता हैं मेरा पता। ढूंढ़ पाना स्वयं को आसान नहीं। सालो से तलाश रही हूँ क्यूँ मिलतीं नहीं। कब तक भटकती रहूंगी, कब ख़त्म होगी मेरी तलाश.

3 comments:

संजय भास्‍कर said...

बहुत ही सुन्दर है यह कविता...

kishore ghildiyal said...

badiya prastuti hetu badhai

Peeyush..... said...

acchi line hai...!!!